टैगोर के कथानक का भावपूर्ण मंचन ’चारुलता’

नाटक ने बंगाल के परिवेश को मंच पर बखूबी प्रस्तुत किया

प्रयागराज

विनोद रस्तोगी जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर वरिष्ठ रंगकर्मी कल्याण घोष की स्मृति में विनोद रस्तोगी स्मृति संस्थान द्वारा 30 दिवसीय नाट्य कार्यशाला कर नाटक चारुलता का मंचन रविवार सायं सांस्कृतिक केन्द्र के प्रेक्षागृह में हुआ। बांग्ला परिवेश की चाशनी में डूबा नाटक चारुलता दर्शकों के हृदय में गहराई तक उतर गया। कथा के ताने-बाने को कलाकारों ने अपने उत्कृष्ट अभिनय से प्रेक्षागृह में सम्प्रेषित किया और दर्शकों ने उसे कभी हंसते हुए तो कभी गीली आंखों से ग्रहण किया।
वैवाहिक जीवन के राग-विराग पर बहुत सी कहानियां लिखी गयी हैं। लेकिन ठाकुर रविन्द्र नाथ की कहानी ‘नष्टनीड़’ अपने में एक अद्भुत रचना है। इस कहानी में दाम्पत्य जीवन के अनोखे पहलुओं का संवेदनात्मक चित्रण है। एक स्त्री के उमंगों, उसके अकेलेपन का बेहद बारीक चित्रण इस कहानी की विशेषता है। मन का साथी न मिल पाने की कचोट वैवाहिक जीवन के सारे भौतिक सुखों को धाराशाई कर देती है और पति पत्नी को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा करती है जहां एक-दूसरे को समझने के सारे रास्ते बंद नजर आते हैं। और यही कारण बन जाता है एक बसे-बसाये घरौंदे, एक नीड़ के उजड़ जाने का…।
नाटक में चारु की भूमिका में गरिमा कुशवाहा ने नारी की मन:स्थिति को बखूबी उजागर किया। वहीं चंचल-चपल अमल की भूमिका में सौरभ शुक्ला ने हर पल ताजगी का अहसास कराया। नाटक में मनोरंजन के साथ नकारात्मक किरदार को बख़ूबी निभाया अहोना भट्टाचार्या एवं रोहित यादव ने। एक व्यस्त संस्कारी कारोबारी के रूप में अभिलाष नारायण भी प्रभावी रहे तथा नौकर की छोटी सी भूमिका में आशीष यादव भी अपनी पहचान छोड़ गए। नाटक को सफल बनाने में सहयोग दिया मंच एवं रंगदीपन सुजॉय घोषाल, मंच संचालन पूजा केसरी, संगीत संचालन शुभम वर्मा, रूपसज्जा संजय चौधरी, प्रस्तुतकर्ता आलोक रस्तोगी, संगीत, परिकल्पना एवं निर्देशन अजय मुखर्जी का रहा।

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